पहली वागड़ी फिल्म- तण वाटे के लिए 14 और 15 अगस्त का ऐतिहासिक महत्व है!
वागड़ (बांसवाड़ा-डूंगरपुर)
पहली वागड़ी फिल्म- तण वाटे के लिए 14 और 15 अगस्त का ऐतिहासिक महत्व है. जहां 14 अगस्त 1986 को पहली वागड़ी फिल्म का मुहूर्त हुआ था, तो फिल्म पूरी होने के बाद 15 अगस्त को फिल्म के निर्देशक- प्रदीप द्विवेदी को बांसवाड़ा कलेक्टर ने प्रशंसा-पत्र प्रदान कर इसे मान्यता प्रदान की थी.
इस फिल्म के निर्माण में प्रमुख कलाकार- भंवर पंचाल, जगन्नाथ तैली, कैलाश जोशी, फिल्मकार सालेह सईद, संगीत निर्देशक- डॉ शाहिद मीर खान, अनिल जैन, हेमंत त्रिवेदी सहित जनसंपर्क विभाग के वरिष्ठ अधिकारी रहे गोपेन्द्र नाथ भट्ट, प्रमुख कवि हरीश आचार्य, प्रमुख पत्रकार नरेंद्र देव त्रिवेदी, नागेंद्र डिंडोर, घनश्याम नूर, हिम्मत लाल हिम्मत, रामनारायण शुक्ला, कुंजबिहारी चौबीसा, सतीश आचार्य सहित सैकड़ों वागड़वासियों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उल्लेखनीय योगदान रहा.
बांसवाड़ा के आजाद चौक में इस फिल्म के मुहूर्त में प्रमुख अतिथि- तत्कालीन जिला प्रमुख पवनकुमार रोकड़िया, राजस्थान स्वायत्त शासन के तत्कालीन उपाध्यक्ष दिनेश जोशी, माही परियोजना के तत्कालीन मुख्य अभियंता डीएम सिंघवी सहित प्रसिद्ध लेखक- ईश्वरलाल वैश्य, विष्णु मेहता, पद्माकर काले, आदित्य काले और हजारों वागड़वासी इस भव्य शुरूआत के साक्षी बने.
अब तो फिल्म बनाना आसान हो गया है, लेकिन तब पहले 8 एमएम के कैमरे से फिल्मांकन ही संभव हो पा रहा था, यही नहीं, मद्रास अब चेन्नई के प्रसाद लैब के पास भी 8 एमएम से 35 एमएम में फिल्म कन्वर्ट करने की सुविधा नहीं थी. उस समय फिल्म बनाना इतना महंगा था कि अनेक फिल्में 16 एमएम पर बना कर 35 एमएम पर कन्वर्ट होती थी और उसके बाद रिलीज होती थी.
अस्सी के दशक में बांसवाड़ा में जो पहला फिल्मांकन किया गया था, वह 16 एमएम पर था और उसे देखने के लिए पूर्व महारावल सूर्यवीर सिंह के महल जाना पड़ा था, क्योंकि उन्हीं के पास प्रोजेक्टर था. इस प्रायोगिक फिल्म का फिल्मांकन तो अच्छा था, परन्तु डबिंग, एडिटिंग और 8 एमएम से 35 एमएम में फिल्म कन्वर्ट करने की सुविधा के अभाव में काम रुक गया.
इस बीच, 1985 में बांसवाड़ा मूल के प्रसिद्ध फोटोग्राफर सालेह सईद विदेश से यहां आ गए. उनके साथ बांसवाड़ा में फिल्मांकन की नई तकनीक भी आ गई. पहली वागड़ी फिल्म के लिए तो एक नई दिशा मिल गई.
अस्सी के दशक में बेरोजगारी की समस्या शुरू हो गई थी, पहली वागड़ी फिल्म- तण वाटे बेरोजगारी की समस्या पर आधारित फिल्म ही है. बेरोजगारों के सामने तीन ही रास्ते हैं.... एक- बेईमानी, दो- ईमानदारी और तीसरा- अर्ध ईमानदारी, मतलब.... स्वयं ईमानदार रहे, लेकिन दूसरों की बेईमानी पर ध्यान नहीं दें.
फिल्म तीन दोस्तों की कहानी है, जो अपनी-अपनी सोच के हिसाब से अपना रास्ता चुनते हैं.
इसमें में भंवर पंचाल, जगन्नाथ तेली, कैलाश जोशी और नागेंद्र डिंडोर प्रमुख कलाकार थे. इस फिल्म में अभियंता भंवर पंचाल ने ईमानदार डॉक्टर की भूमिका निभाई थी, तो जगन्नाथ तेली ने बेईमान बेरोजगार का रोल किया था.
इस फिल्म का संगीत डॉ. शाहिद मीर खान ने दिया था और इसका लोकप्रिय गीत- काम मले तो काम करं ने, ने मले तो हूं करं... भंवर, जगन्नाथ और नागेंद्र डिंडोर पर फिल्माया गया था.
यह फिल्म ऋषभदेव में राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष वेदव्यास को प्रसिद्ध लेखक और दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी रहे शैलेन्द्र उपाध्याय ने भेंट की थी, जिसका पहला भव्य प्रदर्शन प्रसिद्ध कवि हरीश आचार्य के प्रयासों से खड़गदा में हुआ था. इस फिल्म के लिए पुरस्कार भी मिला, जिसने इसे पहली वागड़ी फिल्म होने की मान्यता प्रदान कर दी!
'तण वाटे' मॉडल से बढ़ेगी राजस्थानी फिल्मों की गति: निर्देशक प्रदीप द्विवेदी
फिल्म निर्देशक प्रदीप द्विवेदी ने कहा कि तण वाटे मॉडल से फिल्मों की गति बढ़ेगी। दरअसल 23 अगस्त से उदयपुर में दो दिवसीय राजस्थानी फिल्म महोत्सव शुरू होने जा रहा है। इस दौरान प्रदीप द्विवेदी से बातचीत हुई। उन्होंने कहा कि यदि तण वाटे मॉडल पर राजस्थानी फिल्मों का निर्माण होता है तो न केवल राजस्थानी फिल्मों की गति बढ़ेगी बल्कि फिल्म निर्माण आसान भी होगा। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
सुभाष शर्मा, उदयपुर। राजस्थानी फिल्म महोत्सव इस साल उदयपुर में होने जा रहा है। इसकी तैयारी जोरों-शोरों से चल रही है। दो दिवसीय फिल्म महोत्सव इसी महीने 23 अगस्त से शुरू होगा। जीरो बजट वागड़ी (राजस्थानी) फिल्म 'तण वाटे' के निर्देशक प्रदीप द्विवेदी से बातचीत हुई। उन्होंने कहा कि यदि 'तण वाटे' मॉडल पर राजस्थानी फिल्मों का निर्माण होता है, तो न केवल राजस्थानी फिल्मों की गति बढ़ेगी, बल्कि फिल्म निर्माण आसान भी होगा।
उन्होंने बताया कि 80 के दशक में बनी पहली जीरो बजट वागड़ी (राजस्थानी) फिल्म 'तण वाटे' में प्रमुख कलाकार भंवर पंचाल (उदयपुर), जगन्नाथ तेली, कैलाश जोशी, नागेंद्र डिडोर, केमरामैन सालेह सईद (दुबई), संगीत निर्देशक डॉ शाहिद मीर खान (भोपाल), गायक अनिल जैन, हेमंत त्रिवेदी सहित किसी भी कलाकार ने कोई पारिश्रमिक नहीं लिया था।
उन्होंने बताया कि 80 के दशक में बनी पहली जीरो बजट वागड़ी (राजस्थानी) फिल्म 'तण वाटे' में प्रमुख कलाकार भंवर पंचाल (उदयपुर), जगन्नाथ तेली, कैलाश जोशी, नागेंद्र डिडोर, केमरामैन सालेह सईद (दुबई), संगीत निर्देशक डॉ शाहिद मीर खान (भोपाल), गायक अनिल जैन, हेमंत त्रिवेदी सहित किसी भी कलाकार ने कोई पारिश्रमिक नहीं लिया था।
याद रहे, अशोक नगावत के निर्देशन में पुष्प प्रदेश फिल्म निर्माण समिति का गठन किया गया था, जो सामूहिक प्रयासों से फिल्म निर्माण की धारणा पर आधारित थी और इसी बैनर पर बांसवाड़ा के भागाकोट क्षेत्र में पहली बार शूटिंग हुई थी। निर्देशक प्रदीप द्विवेदी का मानना है कि कलाकार, निर्देशक, संपादक, गायक आदि मिलकर समिति का गठन करें। अपनी योग्यता के सापेक्ष निशुल्क सेवाएं देकर फिल्म का निर्माण करें और फिल्म के लाभ को सदस्यों में वितरित कर दें, तो फिल्म निर्माण आसान और तनावरहित तो होगा ही, फिल्म निर्माण की गति भी बढ़ेगी।
पहली वागड़ी फिल्म- तण वाटे के लिए 14 और 15 अगस्त का ऐतिहासिक महत्व है!
https://www.khaskhabar.com/local/rajasthan/banswara-news/news-august-14th-and-15th-hold-historic-significance-for-the-first-vagdi-film--tan-vate!-news-hindi-1-661675-KKN.html
बांसवाड़ा। पहली वागड़ी फिल्म- तण वाटे के लिए 14 और 15 अगस्त का ऐतिहासिक महत्व है। जहां 14 अगस्त 1986 को पहली वागड़ी फिल्म का मुहूर्त हुआ था, तो फिल्म पूरी होने के बाद 15 अगस्त को फिल्म के निर्देशक- प्रदीप द्विवेदी को बांसवाड़ा कलेक्टर ने प्रशंसा-पत्र प्रदान कर इसे मान्यता प्रदान की थी। इस फिल्म के निर्माण में प्रमुख कलाकार- भंवर पंचाल, जगन्नाथ तैली, कैलाश जोशी, फिल्मकार सालेह सईद, संगीत निर्देशक- डॉ शाहिद मीर खान, अनिल जैन, हेमंत त्रिवेदी सहित जनसंपर्क विभाग के वरिष्ठ अधिकारी रहे गोपेन्द्र नाथ भट्ट, प्रमुख कवि हरीश आचार्य, प्रमुख पत्रकार नरेंद्र देव त्रिवेदी, नागेंद्र डिंडोर, घनश्याम नूर, हिम्मत लाल हिम्मत, रामनारायण शुक्ला, कुंजबिहारी चौबीसा, सतीश आचार्य सहित सैकड़ों वागड़वासियों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उल्लेखनीय योगदान रहा।बांसवाड़ा के आजाद चौक में इस फिल्म के मुहूर्त में प्रमुख अतिथि- तत्कालीन जिला प्रमुख पवन कुमार रोकड़िया, राजस्थान स्वायत्त शासन के तत्कालीन उपाध्यक्ष दिनेश जोशी, माही परियोजना के तत्कालीन मुख्य अभियंता डीएम सिंघवी सहित प्रसिद्ध लेखक- ईश्वरलाल वैश्य, विष्णु मेहता, पद्माकर काले, आदित्य काले और हजारों वागड़वासी इस भव्य शुरूआत के साक्षी बने। अब तो फिल्म बनाना आसान हो गया है, लेकिन तब पहले 8 एमएम के कैमरे से फिल्मांकन ही संभव हो पा रहा था।
यही नहीं, मद्रास अब चेन्नई के प्रसाद लैब के पास भी 8 एमएम से 35 एमएम में फिल्म कन्वर्ट करने की सुविधा नहीं थी. उस समय फिल्म बनाना इतना महंगा था कि अनेक फिल्में 16 एमएम पर बना कर 35 एमएम पर कन्वर्ट होती थी और उसके बाद रिलीज होती थी। अस्सी के दशक में बांसवाड़ा में जो पहला फिल्मांकन किया गया था, वह 16 एमएम पर था और उसे देखने के लिए पूर्व महारावल सूर्यवीर सिंह के महल जाना पड़ा था, क्योंकि उन्हीं के पास प्रोजेक्टर था। इस प्रायोगिक फिल्म का फिल्मांकन तो अच्छा था, परन्तु डबिंग, एडिटिंग और 8 एमएम से 35 एमएम में फिल्म कन्वर्ट करने की सुविधा के अभाव में काम रुक गया।
इस बीच, 1985 में बांसवाड़ा मूल के प्रसिद्ध फोटोग्राफर सालेह सईद विदेश से यहां आ गए. उनके साथ बांसवाड़ा में फिल्मांकन की नई तकनीक भी आ गई। पहली वागड़ी फिल्म के लिए तो एक नई दिशा मिल गई। अस्सी के दशक में बेरोजगारी की समस्या शुरू हो गई थी, पहली वागड़ी फिल्म- तण वाटे बेरोजगारी की समस्या पर आधारित फिल्म ही है। बेरोजगारों के सामने तीन ही रास्ते हैं....एक- बेईमानी, दो- ईमानदारी और तीसरा- अर्ध ईमानदारी, मतलब.... स्वयं ईमानदार रहे, लेकिन दूसरों की बेईमानी पर ध्यान नहीं दें।
फिल्म तीन दोस्तों की कहानी है, जो अपनी-अपनी सोच के हिसाब से अपना रास्ता चुनते हैं। इसमें में भंवर पंचाल, जगन्नाथ तेली, कैलाश जोशी और नागेंद्र डिंडोर प्रमुख कलाकार थे। इस फिल्म में अभियंता भंवर पंचाल ने ईमानदार डॉक्टर की भूमिका निभाई थी, तो जगन्नाथ तेली ने बेईमान बेरोजगार का रोल किया था। इस फिल्म का संगीत डॉ. शाहिद मीर खान ने दिया था और इसका लोकप्रिय गीत- काम मले तो काम करं ने, ने मले तो हूं करं... भंवर, जगन्नाथ और नागेंद्र डिंडोर पर फिल्माया गया था।
यह फिल्म ऋषभदेव में राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष वेदव्यास को प्रसिद्ध लेखक और दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी रहे शैलेन्द्र उपाध्याय ने भेंट की थी, जिसका पहला भव्य प्रदर्शन प्रसिद्ध कवि हरीश आचार्य के प्रयासों से खड़गदा में हुआ था। इस फिल्म के लिए पुरस्कार भी मिला, जिसने इसे पहली वागड़ी फिल्म होने की मान्यता प्रदान कर दी।
https://www.youtube.com/watch?v=y3Zh0czv4r4&t=5s
#Rajasthan पहली वागड़ी फिल्म- तण वाटे के लिए 14 और 15 अगस्त का ऐतिहासिक महत्व है!
https://palpalindia.com/2024/08/14/Rajasthan-first-Vagdi-film-Tan-Vate-14-and-15-August-historical-importance-news-in-hindi.html

बांसवाड़ा (327001) पहली वागड़ी फिल्म- तण वाटे के लिए 14 और 15 अगस्त का ऐतिहासिक महत्व है. जहां 14 अगस्त 1986 को पहली वागड़ी फिल्म का मुहूर्त हुआ था, तो फिल्म पूरी होने के बाद 15 अगस्त को फिल्म के निर्देशक- प्रदीप द्विवेदी को बांसवाड़ा कलेक्टर ने प्रशंसा-पत्र प्रदान कर इसे मान्यता प्रदान की थी.इस फिल्म के निर्माण में प्रमुख कलाकार- भंवर पंचाल, जगन्नाथ तैली, कैलाश जोशी, फिल्मकार सालेह सईद, संगीत निर्देशक- डॉ शाहिद मीर खान, अनिल जैन, हेमंत त्रिवेदी सहित जनसंपर्क विभाग के वरिष्ठ अधिकारी रहे गोपेन्द्र नाथ भट्ट, प्रमुख कवि हरीश आचार्य, प्रमुख पत्रकार नरेंद्र देव त्रिवेदी, नागेंद्र डिंडोर, घनश्याम नूर, हिम्मत लाल हिम्मत, रामनारायण शुक्ला, कुंजबिहारी चौबीसा, सतीश आचार्य सहित सैकड़ों वागड़वासियों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उल्लेखनीय योगदान रहा.बांसवाड़ा के आजाद चौक में इस फिल्म के मुहूर्त में प्रमुख अतिथि- तत्कालीन जिला प्रमुख पवनकुमार रोकड़िया, राजस्थान स्वायत्त शासन के तत्कालीन उपाध्यक्ष दिनेश जोशी, माही परियोजना के तत्कालीन मुख्य अभियंता डीएम सिंघवी सहित प्रसिद्ध लेखक- ईश्वरलाल वैश्य, विष्णु मेहता, पद्माकर काले, आदित्य काले और हजारों वागड़वासी इस भव्य शुरूआत के साक्षी बने.अब तो फिल्म बनाना आसान हो गया है, लेकिन तब पहले 8 एमएम के कैमरे से फिल्मांकन ही संभव हो पा रहा था, यही नहीं, मद्रास अब चेन्नई के प्रसाद लैब के पास भी 8 एमएम से 35 एमएम में फिल्म कन्वर्ट करने की सुविधा नहीं थी. उस समय फिल्म बनाना इतना महंगा था कि अनेक फिल्में 16 एमएम पर बना कर 35 एमएम पर कन्वर्ट होती थी और उसके बाद रिलीज होती थी.अस्सी के दशक में बांसवाड़ा में जो पहला फिल्मांकन किया गया था, वह 16 एमएम पर था और उसे देखने के लिए पूर्व महारावल सूर्यवीर सिंह के महल जाना पड़ा था, क्योंकि उन्हीं के पास प्रोजेक्टर था. इस प्रायोगिक फिल्म का फिल्मांकन तो अच्छा था, परन्तु डबिंग, एडिटिंग और 8 एमएम से 35 एमएम में फिल्म कन्वर्ट करने की सुविधा के अभाव में काम रुक गया.इस बीच, 1985 में बांसवाड़ा मूल के प्रसिद्ध फोटोग्राफर सालेह सईद विदेश से यहां आ गए. उनके साथ बांसवाड़ा में फिल्मांकन की नई तकनीक भी आ गई. पहली वागड़ी फिल्म के लिए तो एक नई दिशा मिल गई.अस्सी के दशक में बेरोजगारी की समस्या शुरू हो गई थी, पहली वागड़ी फिल्म- तण वाटे बेरोजगारी की समस्या पर आधारित फिल्म ही है. बेरोजगारों के सामने तीन ही रास्ते हैं.... एक- बेईमानी, दो- ईमानदारी और तीसरा- अर्ध ईमानदारी, मतलब.... स्वयं ईमानदार रहे, लेकिन दूसरों की बेईमानी पर ध्यान नहीं दें.फिल्म तीन दोस्तों की कहानी है, जो अपनी-अपनी सोच के हिसाब से अपना रास्ता चुनते हैं.इसमें में भंवर पंचाल, जगन्नाथ तेली, कैलाश जोशी और नागेंद्र डिंडोर प्रमुख कलाकार थे. इस फिल्म में अभियंता भंवर पंचाल ने ईमानदार डॉक्टर की भूमिका निभाई थी, तो जगन्नाथ तेली ने बेईमान बेरोजगार का रोल किया था.इस फिल्म का संगीत डॉ. शाहिद मीर खान ने दिया था और इसका लोकप्रिय गीत- काम मले तो काम करं ने, ने मले तो हूं करं... भंवर, जगन्नाथ और नागेंद्र डिंडोर पर फिल्माया गया था.यह फिल्म ऋषभदेव में राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष वेदव्यास को प्रसिद्ध लेखक और दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी रहे शैलेन्द्र उपाध्याय ने भेंट की थी, जिसका पहला भव्य प्रदर्शन प्रसिद्ध कवि हरीश आचार्य के प्रयासों से खड़गदा में हुआ था. इस फिल्म के लिए पुरस्कार भी मिला, जिसने इसे पहली वागड़ी फिल्म होने की मान्यता प्रदान कर दी!https://www.youtube.com/watch?v=y3Zh0czv4r4&t=5s
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