वागड़ में हर-हर महादेव के साथ....
श्रावण मास आरंभ!
प्रदीप द्विवेदी
* श्रावण मास के समय को लेकर देश में मतैक्य नहीं है, पूर्णिमान्त चक्र के अनुसार चन्द्र मास का प्रारम्भ पूर्णिमा से होता है और अमान्त चक्र के अनुसार चन्द्र मास का प्रारम्भ अमावस्या से होता है.
* उत्तर भारत के कई राज्यों- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखण्ड, राजस्थान के लिए पूर्णिमान्त चक्र के अनुसार श्रावण मास का एक पखवाड़ा (22 जुलाई 2024) निकल गया है, लेकिन.... वागड़, गुजरात, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना, गोवा, कर्णाटक, तमिलनाडु राज्यों का श्रावण मास 5 अगस्त 2024 से शुरू है.
*श्रावण मास में तिथि आधारित उपवास के दिन....
शिवभक्त संपूर्ण श्रावण मास में व्रत रखते हैं, साथ ही, श्रावण मास में विविध व्रत, पूजा, अनुष्ठान आदि भी होते हैं.
शुक्ल प्रतिपदा - रोटक व्रत
शुक्ल द्वितीया - औदुम्बर व्रत
शुक्ल तृतीया - स्वर्ण गौरी व्रत, हरियाली तीज
शुक्ल चतुर्थी - दूर्वा गणपति व्रत
शुक्ल पंचमी - नाग पंचमी
शुक्ल षष्ठी - सुपोदान व्रत
शुक्ल सप्तमी - शीतला सप्तमी व्रत
शुक्ल अष्टमी - देवी पवित्ररोपण
शुक्ल नवमी - कुमारी व्रत
शुक्ल दशमी - आशा दशमी व्रत
शुक्ल एकादशी - श्रीधर व्रत, भगवान विष्णु एकादशी व्रत
शुक्ल द्वादशी - भगवान विष्णु पवित्ररोपण
शुक्ल त्रयोदशी - कामदेव षोडश पूजा
शुक्ल चतुर्दशी - शिव पूजा
पूर्णिमा - रक्षा बंधन, हयग्रीव जयन्ती, श्रावणी कर्म
कृष्ण तृतीया - कजरी तीज
कृष्ण चतुर्थी - संकट चतुर्थी व्रत, बहुला चतुर्थी
कृष्ण पञ्चमी - मानव कल्पादि व्रत
कृष्ण षष्ठी - बलराम जयन्ती
कृष्ण अष्टमी - कृष्ण जन्माष्टमी व्रत
कृष्ण चतुर्दशी - श्रावण शिवरात्रि व्रत
अमावस्या - पिठोर व्रत
प्रथम चन्द्र दर्शन का है धार्मिक महत्व!
* चन्द्र दर्शन - 5 अगस्त 2024 (19:12 से 19:58)
* सूर्योदय 06:04, सूर्यास्त 19:12
* चन्द्रोदय 06:36, चन्द्रास्त 20:02
* शक संवत 1946, विक्रम संवत 2081
* अमांत महीना श्रावण, पूर्णिमांत महीना श्रावण
* वार सोमवार, पक्ष शुक्ल, तिथि प्रतिपदा - 18:03 तक, नक्षत्र अश्लेषा - 15:21 तक, योग व्यतिपात - 10:38 तक, करण बव - 18:03 तक, द्वितीय करण बालव
* सूर्य राशि कर्क, चन्द्र राशि कर्क - 15:21 तक
* राहुकाल 07:43 से 09:21
* अभिजीत मुहूर्त 12:12 से 13:04
बांसवाड़ा. गायत्री मण्डल द्वारा स्थापित श्री पीताम्बरा आश्रम में प्रदोष महोत्सव के अन्तर्गत रूद्रार्चन महानुष्ठान शैव आराधना महाआरती एवं श्री भगवन्नाम संकीर्तन के साथ गुरुवार रात सम्पन्न हुआ। इसमें वैदिक परम्परा के अनुरूप पं. राकेश शुक्ला के आचार्यत्व में मुख्य साधक पं. मदन भट्ट एवं श्रीमती इन्दिरा भट्ट ने शिवार्चन विधान पूर्ण किया।
* अमावस्या के बाद प्रथम चन्द्र दर्शन का विशेष धार्मिक महत्व है.
* कई श्रद्धालु चन्द्र दर्शन के बाद ही अपना व्रत खोलते हैं.
* क्योंकि अमावस्या के बाद चन्द्र दर्शन का समय सूर्यास्त के बाद बहुत कम समय के लिए होता है, इसलिए अपने क्षेत्र के सापेक्ष चन्द्र दर्शन का समय ज्ञात कर लें तो चन्द्र दर्शन का लाभ मिल सकता है!
* कई श्रद्धालु चन्द्र दर्शन के बाद ही अपना व्रत खोलते हैं.
* क्योंकि अमावस्या के बाद चन्द्र दर्शन का समय सूर्यास्त के बाद बहुत कम समय के लिए होता है, इसलिए अपने क्षेत्र के सापेक्ष चन्द्र दर्शन का समय ज्ञात कर लें तो चन्द्र दर्शन का लाभ मिल सकता है!
इष्टि के दिन यज्ञ करते हैं!
* इष्टि- 5 अगस्त 2024
* धर्मधारणा के अनुसार- अन्वधान और इष्टि अनिवार्य पर्व हैं.
* अन्वधान के दिन- एक दिन का उपवास रखा जाता हैं और इष्ट के दिन यज्ञ करते हैं.
* इस दिन भगवान श्रीविष्णु के भक्त उनका आह्वान करते हैं और व्रत कर उनकी पूजा करते हैं.
* धर्मग्रंथों में भगवान श्रीविष्णु का एक नाम यज्ञ है, इष्टि के दिन इन्हीं भगवान श्रीविष्णु के निमित्त यज्ञ किया जाता है.
* इस दिन प्रातःकाल पवित्र स्नान आदि करके साफ, स्वच्छ, धुले हुए वस्त्र धारण करें पूजा का संकल्प करें.
* भगवान श्रीविष्णु तथा श्रीलक्ष्मी की पूजा करें तथा हवन करें.
* यथाशक्ति दान-पुण्य करें.
* यह पर्व भौतिक सुख और अध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करनेवाला है, दुर्भाग्य दूर करके समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करनेवाला है!
* अन्वधान के दिन- एक दिन का उपवास रखा जाता हैं और इष्ट के दिन यज्ञ करते हैं.
* इस दिन भगवान श्रीविष्णु के भक्त उनका आह्वान करते हैं और व्रत कर उनकी पूजा करते हैं.
* धर्मग्रंथों में भगवान श्रीविष्णु का एक नाम यज्ञ है, इष्टि के दिन इन्हीं भगवान श्रीविष्णु के निमित्त यज्ञ किया जाता है.
* इस दिन प्रातःकाल पवित्र स्नान आदि करके साफ, स्वच्छ, धुले हुए वस्त्र धारण करें पूजा का संकल्प करें.
* भगवान श्रीविष्णु तथा श्रीलक्ष्मी की पूजा करें तथा हवन करें.
* यथाशक्ति दान-पुण्य करें.
* यह पर्व भौतिक सुख और अध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करनेवाला है, दुर्भाग्य दूर करके समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करनेवाला है!
श्री त्रिपुरा सुंदरी धर्म-कर्म पंचांग : 5 अगस्त 2024
* चन्द्रोदय 06:36, चन्द्रास्त 20:02
* शक संवत 1946, विक्रम संवत 2081
* अमांत महीना श्रावण, पूर्णिमांत महीना श्रावण
* वार सोमवार, पक्ष शुक्ल, तिथि प्रतिपदा - 18:03 तक, नक्षत्र अश्लेषा - 15:21 तक, योग व्यतिपात - 10:38 तक, करण बव - 18:03 तक, द्वितीय करण बालव
* सूर्य राशि कर्क, चन्द्र राशि कर्क - 15:21 तक
* राहुकाल 07:43 से 09:21
* अभिजीत मुहूर्त 12:12 से 13:04
सोमवार चौघड़िया- 5 अगस्त 2024
* दिन का चौघड़िया
अमृत - 06:04 से 07:43
काल - 07:43 से 09:21
शुभ - 09:21 से 11:00
रोग - 11:00 से 12:38
उद्वेग - 12:38 से 14:17
चर - 14:17 से 15:55
लाभ - 15:55 से 17:34
अमृत - 17:34 से 19:12
काल - 07:43 से 09:21
शुभ - 09:21 से 11:00
रोग - 11:00 से 12:38
उद्वेग - 12:38 से 14:17
चर - 14:17 से 15:55
लाभ - 15:55 से 17:34
अमृत - 17:34 से 19:12
* रात्रि का चौघड़िया
चर - 19:12 से 20:34
रोग - 20:34 से 21:55
काल - 21:55 से 23:17
लाभ - 23:17 से 00:38
उद्वेग - 00:38 से 02:00
शुभ - 02:00 से 03:21
अमृत - 03:21 से 04:43
चर - 04:43 से 06:04
रोग - 20:34 से 21:55
काल - 21:55 से 23:17
लाभ - 23:17 से 00:38
उद्वेग - 00:38 से 02:00
शुभ - 02:00 से 03:21
अमृत - 03:21 से 04:43
चर - 04:43 से 06:04
* चौघडिय़ा का उपयोग कोई नया कार्य शुरू करने के लिए शुभ समय देखने के लिए किया जाता है.
* दिन का चौघडिय़ा- अपने शहर में सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच के समय को बराबर आठ भागों में बांट लें और हर भाग का चौघडिय़ा देखें.
* रात का चौघडिय़ा- अपने शहर में सूर्यास्त से अगले दिन सूर्योदय के बीच के समय को बराबर आठ भागों में बांट लें और हर भाग का चौघडिय़ा देखें.
* अमृत, शुभ, लाभ और चर, इन चार चौघडिय़ाओं को अच्छा माना जाता है और शेष तीन चौघडिय़ाओं- रोग, काल और उद्वेग, को उपयुक्त नहीं माना जाता है.
* यहां दी जा रही जानकारियां संदर्भ हेतु हैं, स्थानीय समय, परंपराओं और धर्मगुरु-ज्योतिर्विद् के निर्देशानुसार इनका उपयोग कर सकते हैं, क्योंकि यहां दिया जा रहा समय अलग-अलग शहरों में स्थानीय समय के सापेक्ष थोड़ा अलग हो सकता है.
* रात का चौघडिय़ा- अपने शहर में सूर्यास्त से अगले दिन सूर्योदय के बीच के समय को बराबर आठ भागों में बांट लें और हर भाग का चौघडिय़ा देखें.
* अमृत, शुभ, लाभ और चर, इन चार चौघडिय़ाओं को अच्छा माना जाता है और शेष तीन चौघडिय़ाओं- रोग, काल और उद्वेग, को उपयुक्त नहीं माना जाता है.
* यहां दी जा रही जानकारियां संदर्भ हेतु हैं, स्थानीय समय, परंपराओं और धर्मगुरु-ज्योतिर्विद् के निर्देशानुसार इनका उपयोग कर सकते हैं, क्योंकि यहां दिया जा रहा समय अलग-अलग शहरों में स्थानीय समय के सापेक्ष थोड़ा अलग हो सकता है.
* अपने ज्ञान के प्रदर्शन एवं दूसरे के ज्ञान की परीक्षा में समय व्यर्थ न गंवाएं क्योंकि ज्ञान अनंत है और जीवन का अंत है!
श्री पीताम्बरा आश्रम में प्रदोष महोत्सव में हुआ पंचवक्त्र महानुष्ठान, रूद्रार्चन ऋचाओं, मंत्रों एवं शैव स्तुतियों ने उमड़ाया शिवभक्ति का ज्वार....
इस दौरान् शिवभक्त पण्डितों एवं श्रृद्धालुओं ने षोड़शोपचार से पंचदेव पूजन-अर्चन के उपरान्त रूद्राभिषेक तथा शैव स्तोत्रों, मंत्रों से नर्मदेश्वर का विविध द्रव्यों से अभिषेक किया।
महानुष्ठान में पं. विद्यासागर शुक्ल, पं. चन्द्रेश व्यास, पं. मनोहर एच. जोशी, पं. नीरज पाठक, पं. अरुण व्यास, पं. महेन्द्र कुमार त्रिवेदी, पं. मघुसूदन व्यास, पं. जय रणा, पं. द्रोमिल त्रिवेदी, विनोद चौबीसा, निकुंज सोनी ‘निक्कू’, पं. अजय अधिकारी, पं. मनोज नरहरि भट्ट, विपीन चौबीसा, अनिल एनएच भट्ट, पं. अंकित आचार्य आदि ने वैदिक ऋचाओं के सुमधुर एवं समवेत स्वरों में रागात्मक प्रस्तुति के साथ रूद्र महापूजा में हिस्सा लिया।
आरती विधान में मुख्य साधक पं. मदन भट्ट एवं साधिका इन्दिरा भट्ट ने आरती एवं पुष्पान्जलि विधान पूर्ण किया। इनके साथ ही शिव की विशिष्ट एवं प्राचीन आरती अर्चन में गायत्री मण्डल के मुख्य संरक्षक मुख्य संरक्षक दिलीप गुप्ता, उपाध्यक्ष मनोहर जी. जोशी, कन्हैयालाल जोशी आदि ने भाग लिया।
अन्त में पं. गिरीश जोशी ‘रामायणी’, अशोक पाठक, योगेश पाठक, डायालाल जोशी, रचना व्यास, कल्पना डिण्डोर, पुष्पा व्यास, रचना व्यास, हिमानी पाठक, दिव्यबाला जोशी, दीक्षा व्यास सहित आश्रम के साधकों एवं साधिकाओं तथा श्रृद्धालुओं और भावविभोर होकर शिव स्तुतियों का गान किया व सामूहिक भगवन्नाम संकीर्तन किया।
नर्मदेश्वर शिवलिंग स्थापना....
इससे पूर्व गायत्री मण्डल के मुख्य संरक्षक दिलीप गुप्ता एवं पीताम्बरा शक्ति की साधिका श्रीमती प्रीति गुप्ता ने श्री पीताम्बरा आश्रम में शिवार्चन पूजा, अभिषेक एवं रूद्रार्चन अनुष्ठान के साथ नर्मदेश्वर शिवलिंग की स्थापना की। पूजा विधान एवं स्थापना कार्यक्रम में गायत्री मण्डल के उपाध्यक्ष मनोहर जी. जोशी, पं. जय रणा, पं. मनोहर एच. जोशी, पं. मनोज नरहरि भट्ट ने हिस्सा लिया।

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