श्री त्रिपुरा सुंदरी धर्म-कर्म पंचांग-चौघड़िया : 10 अगस्त 2024....

 

#SkandaSashti आज का दिनः 10 अगस्त 2024, स्कन्द षष्ठी देती है...सुख-संतान-सफलता!


- प्रदीप लक्ष्मीनारायण द्विवेदी (व्हाट्सएप- 8302755688)
* स्कन्द षष्ठी- 10 अगस्त 2024, शनिवार
* षष्ठी तिथि प्रारम्भ - 10 अगस्त 2024 को 03:14 बजे
* षष्ठी तिथि समाप्त - 11 अगस्त 2024 को 05:44 बजे

* दक्षिण भारत में स्कन्द सुप्रसिद्ध देवता हैं, जिनकी पूजा से संपन्नता प्राप्त होती है। 
* स्कन्द देव, भगवान भोलेनाथ और देवी पार्वती के पुत्र और भगवान श्रीगणेश के भाई हैं। 
* दक्षिण भारत में भगवान स्कन्द को मुरुगन, कार्तिकेय, सुब्रह्मण्य आदि स्वरूपों में जाना जाता है।
* षष्ठी तिथि भगवान स्कन्द को समर्पित है। 
* सूरसम्हाराम के बाद आने वाली अगली स्कन्द षष्ठी को सुब्रहमन्य षष्ठी पुकारते हैं। 
* दक्षिण भारत में पलनी मुरुगन मन्दिर, स्वामीमलई मुरुगन मन्दिर, तिरुत्तनी मुरुगन मन्दिर, पज्हमुदिचोर्लाई मुरुगन मन्दिर, श्री सुब्रह्मण्य स्वामी देवस्थानम, तिरुप्परनकुंद्रम मुरुगन मन्दिर, मरुदमलै मुरुगन मन्दिर आदि प्रमुख एवं प्राचीन कार्तिकेय के मंदिर हैं।
* भगवान कार्तिकेय की पूजा स्कन्द षष्ठी के दिन की जाती है। 
* कार्तिकेय के पूजन से रोग-दोष, दुःख-दारिद्र का निवारण होता है। 
* धर्मग्रंथों के अनुसार नारद-नारायण संवाद के दौरान संतान प्राप्ति और संतान की पीड़ाओं का शमन करने के लिए इस व्रत का विधान बताया गया है। 
* धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कन्द की छह कृतिकाओं ने स्तनपान करा कर रक्षा की थी। इनके छह मुख हैं और उन्हें कार्तिकेय नाम से पुकारा जाने लगा। 
* भोलेनाथ और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय की पूजा मुख्यत: दक्षिण भारत, खासतौर पर तमिलनाडु में होती है।
* भगवान कार्तिकेय के प्रमुख मंदिर तमिलनाडु में ही हैं। 
* धर्मधारणा है कि... स्कंद षष्ठी की उपासना से च्यवन ऋषि को आंखों की ज्योति प्राप्त हुई... स्कंद षष्ठी के पाठ से प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो गया। 
* धर्मग्रंथों में उल्लेख है कि... स्कन्द की उत्पत्ति अमावस्या को अग्नि से हुई थी, वे चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी को प्रत्यक्ष हुए थे, देवों के द्वारा सेनानायक बनाये गये थे तथा तारकासुर का वध किया था, अत: उनकी पूजा, दीपों, वस्त्रों, अलंकरणों, आदि से की जाती है, साथ ही, स्कंद षष्ठी पर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। 
* कार्तिकेय की स्थापना कर अखंड दीपक जलाए जाते हैं, विशेष कार्य की सिद्धि के लिए इस समय की गई पूजा-अर्चना विशेष फलदायी होती है!


#Saturday श्री त्रिपुरा सुंदरी धर्म-कर्म पंचांग-चौघड़िया : 10 अगस्त 2024

श्री त्रिपुरा सुंदरी धर्म-कर्म पंचांग-चौघड़िया : 10 अगस्त 2024 इस प्रकार है....
* शक संवत 1946, विक्रम संवत 2081
* अमांत महीना श्रावण,पूर्णिमांत महीना श्रावण
* वार शनिवार, पक्ष शुक्ल, तिथि षष्ठी - 05:44, (11 अगस्त 2024) तक, नक्षत्र चित्रा - 05:49, (11 अगस्त 2024) तक, योग साध्य - 14:52 तक, करण कौलव - 16:31 तक, द्वितीय करण तैतिल - 05:44, (11 अगस्त 2024) तक
* सूर्य राशि कर्क, चन्द्र राशि कन्या - 16:18 तक
* राहुकाल 09:22 से 11:00
* अभिजीत मुहूर्त 12:11 से 13:03

* दिन का चौघड़िया
काल - 06:06 से 07:44
शुभ - 07:44 से 09:22
रोग - 09:22 से 11:00
उद्वेग - 11:00 से 12:37
चर - 12:37 से 14:15
लाभ - 14:15 से 15:53
अमृत - 15:53 से 17:31
काल - 17:31 से 19:09

* रात्रि का चौघड़िया
लाभ - 19:09 से 20:31
उद्वेग - 20:31 से 21:53
शुभ - 21:53 से 23:15
अमृत - 23:15 से 00:38
चर - 00:38 से 02:00
रोग - 02:00 से 03:22
काल - 03:22 से 04:44
लाभ - 04:44 से 06:06

* चौघडिय़ा का उपयोग कोई नया कार्य शुरू करने के लिए शुभ समय देखने के लिए किया जाता है.
* दिन का चौघडिय़ा- अपने शहर में सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच के समय को बराबर आठ भागों में बांट लें और हर भाग का चौघडिय़ा देखें.
* रात का चौघडिय़ा- अपने शहर में सूर्यास्त से अगले दिन सूर्योदय के बीच के समय को बराबर आठ भागों में बांट लें और हर भाग का चौघडिय़ा देखें.
* अमृत, शुभ, लाभ और चर, इन चार चौघडिय़ाओं को अच्छा माना जाता है और शेष तीन चौघडिय़ाओं- रोग, काल और उद्वेग, को उपयुक्त नहीं माना जाता है.
* यहां दी जा रही जानकारियां संदर्भ हेतु हैं, स्थानीय समय, परंपराओं और धर्मगुरु-ज्योतिर्विद् के निर्देशानुसार इनका उपयोग कर सकते हैं, क्योंकि यहां दिया जा रहा समय अलग-अलग शहरों में स्थानीय समय के सापेक्ष थोड़ा अलग हो सकता है.
* अपने ज्ञान के प्रदर्शन एवं दूसरे के ज्ञान की परीक्षा में समय व्यर्थ न गंवाएं क्योंकि ज्ञान अनंत है और जीवन का अंत है!

#KalkiJayanti कल्कि अवतार! अश्व के चौथे पैर का इंतजार हो रहा है कि कब यह धरती पर टिकेगा?

* कल्कि जयन्ती - शनिवार, 10 अगस्त 2024
* कल्कि जयन्ती मुहूर्त - 16:32 से 19:09
* षष्ठी तिथि प्रारम्भ - 10 अगस्त 2024 को 03:14 बजे
* षष्ठी तिथि समाप्त - 11 अगस्त 2024 को 05:44 बजे

दक्षिण राजस्थान में स्थित बेणेश्वर धाम परिसर में श्रीविष्णु के कल्कि अवतार की प्राचीन मूर्ति है, कई कारणों से बेणेश्वर धाम परिसर आकर्षण का केंद्र हैं....
1. यहां का स्वयंभू शिवलिंग खंडित है, बावजूद इसके इसकी पूजा होती है.
2. इस शिवलिंग का आकार लगातार बढ़ रहा है, राजस्थान के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष दिवंगत महारावल लक्ष्मण सिंह ने साक्षात्कार के दौरान मुझे बताया था कि- वे नियमितरूप से इसकी पूजा करते रहे हैं और उन्होंने देखा था कि कुछ वर्षों में ही यह शिवलिंग करीब ढाई इंच बड़ा हो गया.
3. यहां श्रीविष्णु के कल्कि अवतार की मूर्ति है, जिसमें घोड़े पर सवार निष्कलंक भगवान हैं, यह घोड़ा तीन पैर पर खड़ा है, धर्मधारणा है कि जब चौथा पैर धरती पर टिक जाएगा तब धरती पर कल्कि अवतार आएंगे.
4. यहां हर साल माही, सोम और जाखम नदियों के त्रिवेणी संगम पर सबसे बड़ा आदिवासियों का कुंभ मेला लगता है, जिसमें लाखों आदिवासी आते हैं.
5. यहीं संगम में अस्थियां भी विसर्जित की जाती हैं.
6. संत मावजी महाराज औदिच्यधाम बेणेश्वर के आद्य पीठाधीश्वर हैं, जिनका जन्म साबला गांव में विक्रम संवत् 1771 में माघ शुक्ल पंचमी को हुआ था.
7. मावजी महाराज ने भविष्यवाणियों सहित विविध धार्मिक ग्रंथ लिखे, जिन्हें मावजी 'महाराज के चौपड़े' के तौर पर जाना जाता है.
8. मावजी की पुत्रवधू जनकुंवरी ने बेणेश्वर धाम पर सर्वधर्म-समभाव श्रीविष्णु मंदिर का निर्माण करवाया था.
9. बेणेश्वर के लिए मावजी महाराज ने कहा था- सब देवन का डेरा उठसे, निष्कलंक का डेरा रहेसे, मतलब.... सबकुछ नष्ट हो सकता है, लेकिन- कलयुग में अवतार लेने वाले निष्कलंक का डेरा रहेगा, जहां सभी धर्मों के लोगों को आश्रय प्राप्त होगा!








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